चंद रोज़ा जनाब है दुनिया
आख़िरत का हिसाब है दुनिया
तुम हक़ीक़त समझ रहे थे इसे
मैं न कहता था ख़्वाब है दुनिया
तुम अगर साथ हो तो जन्नत है
बिन तुम्हारे 'अज़ाब है दुनिया
अपने 'ऐबों से बे-ख़बर हूँ मैं
कैसे कह दूँ ख़राब है दुनिया
जिस को तुम ज़िंदगी समझते हो
मौत ज़ेर-ए-नक़ाब है दुनिया
एक कमसिन की मस्त आँखों का
कोई भूला सा ख़्वाब है दुनिया
पढ़ न पाओ समझ न पाओ जिसे
एक ऐसा निसाब है दुनिया
Poet : Sahib Ahmedabadi
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