बहिश्त से भी है अफ़ज़ल फ़ज़ा मदीने में
हमारे दर्द की बस है दवा मदीने में
वसीला इस्म-ए-मोहम्मद का इस्म-ए-आज़म है
कभी तो मांग के देखो दुआ मदीने में
बस एक बार मेरी इल्तिजा सुनी जाए
हयात हो मेरी मक्का, क़ज़ा मदीने में
हर एक लौटने वाला पुकारता है यही
फिर एक बार बुलाए ख़ुदा मदीने में
पलट के जिस्म तो आया है साथ साथ मगर
हमारा दिल तो वहीं बस गया मदीने में
तमाम शाह ओ गदा हैं गदा उसी दर के
अजब है रहमत-ए-फ़ैज़-ए-ख़ुदा मदीने में
Poet Sahib Ahmedabadi
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