Thursday, 27 July 2017

DUA AND AHDEESH RELATED TO MONSOON- तेज़ बारिश आंधी तूफ़ान के वक़्त की दुआ -BAARISH KI DUA- HINDI-ENGLISH

                      بسم الله الرحمان الرحیم 


Barish ki Dua – Dua for Rain –

Barish rokne ki Dua


In this post, you can read Dua for rain 
(Barish ke liye dua), Dua when it rains (Barish ki dua) and Dua to Stop Rain (barish rokne ki dua

Dua for Rain in Arabic :

اللّهُمَّ اَسْقِـنا غَيْـثاً مُغيـثاً مَريئاً مُريـعاً، نافِعـاً غَيْـرَ ضَّارٌ، عاجِـلاً غَـيْرَ آجِلٍ

Barish ke liye dua in Urdu :

اے اللہ! ہمیں ایسی بارش سے سیراب کر جو فائدہ مند ،سر سبز و شاداب ، نفع بخش ، نقصان نہ دینے والی اور جلد برسنے والی ہو

Dua for Rain in English :

O Allah, shower upon us abundant rain, beneficial not harmful, swiftly and not delayed.

Barish ke liye dua in Arabic :

Allaahumma ‘asqinaa ghaythan mugheethan maree’an maree’an, naafi’an ghayradhaarrin, ‘aajilan ghayra ‘aajilin.


Dua when it rains in Arabic:

اللّهُمَّ صَيِّـباً نافِـعاً

Barish ki dua in Urdu :

اے اللہ! اسے نفع بخش بارش بنادے

Dua when it rains in English :

O Allah, (bring) beneficial rain clouds.

Barish ki dua in Arabic :

Allaahumma sayyiban naafi’an.

Dua to Stop Rain in Arabic :

اللّهُمَّ حَوالَيْنا وَلا عَلَيْـنا، اللّهُمَّ عَلى الآكـامِ وَالظِّـراب، وَبُطـونِ الأوْدِية، وَمَنـابِتِ الشَّجـر

Barish rokne ki dua :

Allaahumma hawaalaynaa wa laa ‘alaynaa. Allaahumma ‘alal-‘aakaami wadh-dhiraabi, wa butoonil-‘awdiyati, wa manaabitish-shajari.

Barish rokne ki dua in English :

O Allah, let it pass us and not fall upon us, but upon the hills and mountains, and the center of the valleys, and upon the forested lands.
Being a Muslim it is our belief that all the universe(Sun, Moon, Stars etc) is in control of Allah. All the weathers, cloud’s, winds are in His control. It is He Who gives the rain and stop the rain. There are many prayers which can be said for rain. There are prayers for rain, prayers for when it rain and prayers to stop the rain. There are times when we need rain and it is for our benefit at those times we pray for rain. But there are times when we don’t need rain and it is not good for us if it rains, at those times we pray that it should not rain on us.

We all know that rain is very important for life on earth but we also know that rain can bring destruction to the life on earth. On one side where we see benefits of rain like it raises trees and different kind of crops, on the other hand, we see disadvantages of rain like extensive rain bring floods. So we all should learn barish ki dua, dua for rain, barish rokne ki dua and we should always pray to Allah for the rain which brings good things for us and pray so that all the evils stay away from us.


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आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है कि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब बारिश को देखते थे तो फरमाते थे : ‘‘अल्लाहुम्मा सैयिबन नाफिअन’’ (ऐ अल्लाह, इसे लाभकारी बारिश बना)। इसे बुखारी (हदीस संख्या : 1032) ने रिवायत किया है।
तथा अबू दाऊद (हदीस संख्या : 5099) की एक रिवायत के शब्द में है कि आप फरमाते थे : ‘‘अल्लाहुम्मा सैयिबन हनीअन’’ (ऐ अल्लाह, इसे सुखद बारिश बना)। इसे अल्बानी ने सही कहा है।
‘‘अस-सैयिब’’ उस बारिश को कहते हैं जो बहने वाली हो। और इस शब्द का मूल स्रोत है : साबा, यसूबो ; जब बारिश हो। अल्लाह तआला का कथन है :
﴿أو كصيبٍ من السماء﴾ [البقرة :19]
‘‘या आकाश से होनेवाली बारिश के समान।'' (सूरतुल बक़रा 2: 19).
उसका वज़न ‘‘अस-सौब’’ शब्द से ‘‘फैइल’’ है।
देखें : खत्ताबी की ‘‘मआलिमुस-सुनन’’ (4/146) .
तथा बारिश के सामने होना ताकि वइ मनुष्य के शरीर के कुछ हिस्से को लग जाए, मुस्तहब (ऐच्छिक) है। क्योंकि अनस रज़ियल्लाह अन्हु से प्रमाणित है कि उन्हों ने कहा : हम अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ थे कि हमें बारिश पहुँची। वह कहते हैं कि : तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपना कपड़ा हटा दिया यहाँ तकि कि आपके शरीर पर बारिश लग गई। तो हमने कहा : ऐ अल्लाह के पैगंबर, आप ने ऐसा क्यों कियाआप ने फरमाया : ''क्योंकि वह आपके पालनहार के पास से अभी अभी आई है।’’
इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 898) ने रिवायत किया है।
तथा जब बारिश सख्त हो जाती थी तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यह दुआ करते थे : ‘‘अल्लाहुम्मा हवालैना वला अलैना, अल्लाहुम्मा अलल आकामि, वजि़्ज़राबि, व बुतूनिल अवदियह, व मनाबितिश्शजर’’ (ऐ अल्लाह, हमारे आसपास बारिश बरसा हमारे ऊपर नहीं, ऐ अल्लाह टीलों, पहाड़ियों, घाटियों के बीच में और पेड़ों के उगने के स्थानों में बरसा)। इसे बुखारी (हदीस संख्या : 1014) ने रिवायत किया है।
रही बात बादल की गरज सुनने के समय दुआ की : तो अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु से प्रमाणित है कि : ‘‘जब वह बादल की गरज सुनते थे तो बातचीत त्याग देते थे और कहते थे : ‘‘सुब्हानल्लज़ी युसब्बिहुर-रअ्दो बि-हम्दिहि वल-मलाइकतो मिन खीफतिहि‘‘ (पवित्रता है वह अस्तित्व जिसकी स्तुति व गुणगान के साथ बादल की गरज पवित्रता का वर्णन करती है और फरिश्ते भी उसके डर से।’’ (अर-रअद: 13), फिर वह कहते : यह पृथ्वी वालों के लिए कड़ी चेतावनी है।’’ इसे बुखारी ने ‘‘अल-अदबुल मुफ्रद’’ (हदीस संख्या : 723) और मालिक ने ''अल-मुवत्ता’’ (हदीस संख्या : 3641) में रिवायत किया है और नववी ने ‘‘अल-अज़कार’’ (हदीस संख्या : 235) में तथा अल्बानी ने ''सहीहो अदबिल मुफ्रद’’ (हदीस संख्या : 556) में इसकी इसनाद को सहीह करार दिया है।
इसके बारे में हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मनसूब कोई बात नहीं जानते हैं।
इसी तरह, हमारे ज्ञान के अनुसार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से बिजली देखने के समय कोई ज़िक्र या दुआ साबित नहीं है। और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।
दूसरा :
बारिश के अवतरित होने का समय, अल्लाह की अपने बंदों पर दया और कृपा करने, और उनके ऊपर भलाई के कारणों का विस्तार करने का समय है, तथा उस समय दुआ के क़बूल किए जाना की संभावना है। सहल बिन सअद रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में मरफूअन (जिसकी इसनाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तक पहुँचती हो) आया है कि : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ''दो (दुआएं) रद्द नहीं की जाती हैं : अज़ान के समय, और बारिश के नीचे दुआ करना।’’ इसे हाकिम ने ''अल-मुस्तदरक'' (हदीस संख्या : 2534) और तब्रानी ने ‘‘अल-मोजमुल कबीर’’ (हदीस संख्या : 5756) में रिवायत किया है और अल्बानी ने सहीहुल जामि (हदीस संख्या :  3078) में सहीह कहा है।
अज़ान के समय दुआ से अभिप्राय : अज़ान के समय या उसके बाद दुआ करना है।
तथा बारिश के नीचे से अभिप्राय बारिश उतरने का समय है।
और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है

Tuesday, 18 July 2017

DARGAH SHAREEF HAZRAT ABDUL WAHAB SAHIB NAGAUR-RAJASTHAN-INDIA



                            بسم الله الرحمان الرحیم 

    Sayed Shaikh Saifuddin Abdul Wahab was the eldest son of Hazrat Abdul Qadir Jilani (Allah's mercy be on him), born in 521 AH. He learned Fiqh and Hadis from his father and by the age of 21 he had become a teacher in his father’s Jamia. He was a very good orator and was respected by all. The Caliph of baghdad Nasiruddin Ahmed appointed him as a public relation officer (575 AH – 622 AH). This helped him to serve the poor and needy. He also issued Fatwas later on and became advisor to the royal household. He died on 25th Shawwal 593 AH and was buried at Jalba-Baghdad. His sons lived in Baghdad and were known for their piety and knowledge and continued to preach the mission of their grandfather, Hazrat Abdul Qadir Jilani (Allah's mercy be on him).



AASTANA-E- AALIYA OF HAZRAT ABDUL WAHAB JILANI (RA), THE ELDEST SON OF HAZRAT GAUS PAAK (RA), THIS DARGAH IS LOCATED IN NAGAUR ITLSELF FEW KILO METRES FROM HAZRAT KHWAJA HAMIDUDDIN (ra).




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Monday, 3 July 2017

TEZ ANDHI KE WAQT KI DUA HINDI ENGLISH URDU-

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Monday, 19 June 2017

ख्वाजा गरीब नवाज- मोईनुद्दीन चिश्ती अजमेर-ALL ABOUT KHWAJA E AJMER MOINUDDIN CHISHTI R.A- PART-1


                                           بسم الله الرحمان الرحیم 

हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन हसन अली अजमेरी रहमतुल्लाह अलैहि 537 हिजरी में खुरासान के सन्जर नामक गांव में पैदा हुए. ख्वाजा बुजुर्ग के वालिद माजिद का नाम सैयद गियासुद्दीन हसन है, वह आठवीं पुश्त में हजरत मूसा काजिम के पाते होते है। वालिदा माजिदा का नाम बीबी उम्मुलवरा उर्फ बीबी माहे नूर है जो चन्द वास्तों से हजरत इमाम हसन की पोती होती है। इसलिए आप बाप की तरफ से हुसैनी और माँ की तरफ से हसनी सैयद है।

ख्वाजा साहब शुरू से ही दुरवेशों, सूफियों और फकीरों की संगत में बैठते, उनका अदब करते और उनसे मुहब्बत रखते थे। एक रोज आप अपने बाग में पौधों को पानी दे रहे थे कि एक बुजुर्ग शेख इब्राहीम कन्दोजी र.अ.थे। ख्वाजा साहब की नजर जब उन पर पड़ी तो सब काम छोड़कर आपके पास आ गये और आपके हाथ को चूमा और बहुत अदब से एक सायादार पेड़ की छांव में लाकर बिठाया। और तो कोई सामान था नही मगर इन दिनो अंगूर का मौसम था और अंगूर के खुशनूमा गुच्छे लटक रहे थे। ख्वाजा साहब ने अंगूरो का एक पका हुआ गुच्छा तोड़कर उनको पेश किया और उनके सामने अदब से बैठ गये । अल्लाह वाले बुजुर्ग को आपकी यह अदा बहुत पसन्द आई और उन्होने खुशी से नोश फरमाये। बुजुर्ग की खुदा शनास नजरों से फौरन ताड़ लिया कि यह होनहार बच्चा राहे हक का तालिब है। उन्होने अपनी जेब से खली का एक टुकडा निकाला और उसको अपने दांतो से चबाकर ख्वाजा साहब के दहने मुबारक (मुख) में डाल दिया। हमारे ख्वाजा क्योंकि शुरू से ही दुरवेशों का अदब करते और फकीरों से मुहब्बत रखते थे, इसलिए इब्राहीम कन्दोजी र.अ. के दिये हुए खली के टुकडे को खा गये। फिर क्या था, आपका दिल दुनिया से उचट गया और वहम के सभी परदे हट गये। खली का वह टुकड़ा हलक से उतरना था कि आप रूहानियत की दुनिया में पहुच गये, दिल में एक जोशे हैरत पैदा हो गया, आंख खुली रह गई। जब आप उस हालत से बाहर आये तो अपने को तन्हा पाया। शेख इब्राहीम कन्दोजी र.. जैसे आये थे वैसे ही चल दिये।
शेख इब्राहीम कन्दोजी र.. तो चल दिये लेकिन हमारे ख्वाजा ने जो जलवा देखा था वह आपकी नजरों के सामने फिर रहा था और ऐसा नही था जिसको फरामोश किया जा सकता। वर बार-बार इसको देखने की ख्वाहिश करते। आपने हर मुमहनि सब्र और तहम्मुल से काम लिया मगर फिर भी दिल काबू में न रहा। इश्क की आग भड़क उठी और जब दीवानगी हद से बढ़ने लगी तो आपकी नजरों में दुनिया और इसकी दौक्लत हकीर नजर आने लगी। चुनाचे बाग और पवन चक्की को बेचकर, और जो कुछ नगद व सामान पास मौजूद था, राहे खुदा में फकीरों और बेसहारों में बांट दिया और थोड़ा सा जरूरी सामान साथ लेकर तलाशे हक में निकल पड़े।
शेख इब्राहीम कन्दोजी र.. ने जब से हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती र.. को इश्के इलाही की झलक दिखाई थी उसी वक्त से आपका दिन बेकरार था। और जब तालीम की हवा ने इश्क की आग का भझ़का दिया। इस तरह आपने एक दिन समरकन्द को भी छोड़ा और अल्लाह का नाम लेकर मगरीब (पश्चिम) की जानिब रवाना हो गये। मगरीब की सरजमीन बड़े-बड़े आरिफाने हक के मजारों से भरी पड़ी थी। और बड़े-बड़े खुदा रसीदा बुजुर्ग उस सरजमीन पर मौजूद थे, जहां कदम-कदम पर फैज के दरिया जारी थे। समरकन्द से एक रास्तर दक्षिण की तरफ बल्ख को जाता है। आप इसी रास्ते पर कामिल पीर की तलाश में चल पड़े मगर इस तमाम सफर में कोई पीरे कामिल न मिला और आप बराबर चलते रहे जैसे कोई गैबी कशिश आपको खींचते लिए जा रही हो। नेशापुर से कुच्छ  ही दूर चले थे कि कसबा हरवन में पहोंच गये।
कस्वा हारून एक छोटा-सा कस्बा था और इन दिनो वहां हजरत ख्वाजा शेख उस्मान तशरीफ़ फर्मा थे.
हजरत शेख उस्मान हारूनी र. महान औलियाओं में से थे और आपको फैज व बरकत की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी, हाजतमन्द और अल्लाह के चाहने वाले अपनी मुरादों की झोलियां भर-भर कर ले जाते थे।
हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र.. के इश्क का जज्बा आखिकार आपको मंजिल पर ले आया, यानी आप कस्वा-ए-हारून में दाखिल हो गये। उस वक्त आपकी खुशी की इन्तिहा न रही क्योकि आपने अब चश्मा-ए-आबे बका को पा लिया था यानी पीरे कामिल को पा लिया था।
हमारे ख्वाजा र.. दूर से सफर करते हुए हारून पहुंचे थे इसलिए आपका जिस्म मुबारक गर्द आलूद (धूल युक्त) हो गया था और लिबास गुबार में अटा हुआ थो। आप बेकरा जरूर थे मगर चेहरे पर ताजगी और संजीदगी (गंभीरता) दिखाई देती थी। हजरत गरीब नवाज र.. ने हजरत ख्वाजा शेख उस्मान हारूनी र.. के दस्ते हम परस्त पर बैअत की और ख्वाजा उस्मान हारूनी र.. ने आपको अपने शागिर्दो में शामिल कर लिया

हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती एक मुद्दत से ही हजरत ख्वाजा उस्मान हारूनी र.अ. से अकीदत रखते थें अब इस कदर शेदाई हो गये कि हर वक्त सफर हो या कियाम  हो अपने गुरू की खिदमत में हाजिर रहते। उनका बिसतर, तकिया, पानी का मशकीजा अज्ञैर दूसरा जरूरी सामान अपने सर और कन्धों पर रखकर हमसफर (साथ-साथ) होते थे। हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र.. बीस साल तक अपने पीर की खिदमत में रहकर अल्लाह तआला की इबादत करते रहे। और उसी अर्स में मारफत व हकीकत की सभी मंजिलें तय कर ली और फकीरी से अच्छी तरह वाकिफ हो गये


हुजूर ख्वाजा गरीब नवाज र.. के इर्शादात अहले बसीरत के लिए बेश कीमत खजाना है। अल्लाह तआला हमें उनकों समझने और उन पर अमल करने की तौफीक अता फरमाये।
1. गुनाह करने से इतना नुक्सान नही होता जितना कि अपने किसी भाई को हकीर (तुच्छ) या जलील समझने से।
2.
फकीरी का मुस्ताहिक (लायक) वह शख्स होता है जो दुनिया-ए-फानी में अपने पास कुछ न रखे।
3.
बन्दे पर फकीर का शब्द उस वक्त लागू है कि जब आठ साल तक बायें हाथ का फरिश्ता जो बदी लिखने वाला है उसके आमालनामें में एक भी बदी न लिखे।
4.
खुदा की शनाख्त (पहचान) उस शख्स को होगी जो दुनिया वालों से अलग रहे और खुद को बड़ा न समझें।
5.
खामोश और गमगीन रहना आरिफों की एक अलामत (पहचान) है।
6.
पूरी दुनियां और कायनाते आलम को अपनी दो उंगलियों में देखना इरफान का एक दर्जा है।
7.
बुजुर्ग वह है जो अपना दिल दोनों जहान से उठा ले और हरदम आलमे गैब से लाखों तजल्लियां उस पर जाहिर हों और अल्लाह की राह में वह अल्लाह तआला के सिवा किसी से मदद न चाहे।
8.
नमाज मोमिनीन को अल्लाह तआला से मिलायेगी, इसकी हिफाजत पूरी तरह करनी चाहिए।
9.
हर रोज आसमान से दो फरिश्ते उतरते है। उनमें से एक पुकारता है कि जिससे फर्जे इलाही जान-बूझकर छूट गया वह अल्लाह तआला की जमानत से बाहर हो गया। फिर दूसरा कहता है कि जिसने रसूलुल्लाह स... की सुन्नत को छोड़ा वह कियामत के रोज शफाअत से महरूम रहेगा।
10.
जो शख्स पांचो वक्त पाबन्दी के साथ नमाज अदा करता है कियामत के दिन उसकी नमाज उसकी हिफाजत और निगहबानी करेगी।
11.
जो शख्स फज्र की नमाज पढ़ कर सूरज उगने तक उसी जगह बैठा रहे और नमाजे इशाराक पढ़ कर उठे तो हक तआला उसे मय सतर हजार आदमियों के जो उसके अह्रल (योग्य) हों बख्श देता है।
12.
पांच चीजो का देखना इबादत है, चाहे वे चीजे अलग्7अलग क्यों न देखी जायें-
(1)
मां-बाप का देखना
(2)
कुरआन मजीद का देखना
(3)
अल्लाह वालों को देखना
(4)
खाना-ए-काबा का देखना
(5)
अपने पीरे तरीकत का देखना
13.
बाज (कुछ) बुजुर्ग ने सुलूक के सौ दर्जे मुकर्रर किए है। उनमें सत्तर दर्जे तय करने के बाद कश्फ व करामात का रूतबा हासिल होता है। जो शख्स अपने आपको कश्फ व करामात के दर्जे में जाहिर नही करता वह बाकी तीस दर्जे भी तय कर जाता है। बस, बुजुर्गी के लिए जरूरी है क वह अपने आपको उस दर्जे में जाहिर न करें और पूरे सौ दर्जे तय कर लें।
14.
हमारे खानदाने सुलूक के पन्द्रह दर्जे है। पांचवां दर्जा कश्फ व करामात का है। हमारे बजुर्गो ने वसीयत की है कि पांचवें दर्जे पर ही न ठहरे बल्कि पूरे पन्द्रह दर्जे हासिल कर ले।
15.
मुहब्बत के चार दर्जे है-
(1)
हमेशा अललाह तआला का जिक्र करना।
(2)
जिक्र इलाही को खूब दिल लगाकर करना और उसके जिक्र में खुश रहना।
(3)
वह खूबी पैदा करना जो दुनियावी मुहब्बत से अलग हो।
(4)
हमेशा रोते रहना।
16.
जो शख्स ाहता है कियामत के सख्त (भयानक) अजाब से महफूज रहे तो उसके लिए लाजमी है कि वह मुसीबत में रहने वालों की फरियाद सुने, जरूरतमन्दों की जरूरत पूरी करें और भूखों को पेट भर कर खिलायें।
17.
चार काम नफ्स के लिए जीनत (शोभा) है-
(1)
भूखे को खाना खिलाना।
(2)
मुसीबत जदा की मदद करना।
(3)
जरूरतमन्दों की जरूरत पूरी करना।
(4)
दुश्मन से मेहरबानी और अच्छे सुलूक से पेश आना।
18.
जिस शख्स में तीन खासियतें हों खुदा उसको दोस्त रखता है-
(1)
दरिया जैसी सखावत
(2)
सूरज जैसी शफ्कत (भलाई)
(3)
जमीन जैसी तवाजों।
19.
नेक काम करने से बेहतर नेकों की सोहबत और बुरे काम करने से बदवर बुरों की सोहबत है।
20.
सोहबत का असर जरूर होता है। बुरी सोहबत से बुरा असर और नेक सोहबत से अच्छा असर होता है।
21.
हाजत रवाई के लिए सूरः फातिहा पढ़ना बेहद फायदेमन्द साबित हुआ है।
22.
नदी नाले औश्र दरिया के पानी में आवाज होती है लेकिन जब वह समुद्र से जाकर मिल जाते है तो कामिल सुकून हो जाता है, इसी मिसाल को सुलूक की मन्जिलें मान लेना चाहिए।
23.
हर दौरे में दुनिया के अन्दर खुदा के सैकड़ो ऐसे मक्बूल व प्यारे बन्दे होते हैं जिन्हें कोई नहीं जानता और वह गुमनामी के गोशे में इन्तिकाल (देहान्त) फरमा जाते है। अतः दुनिया को औलियाओं से खाली मत समझों।
24.
खुदा की पहचान उसे हागी जो लोगों से अलग-थलग रहे। दुनियादार बुजुर्ग होने का दावा न करें।
25.
बुजुर्गी की निशानी यह है कि खुदा के सिवा तमाम चीजों की मुहब्बत दिल से निकाल दें।
26.
सिर्फ दिल और जिस्म से काबे का तवाफ न करें क्योकि आरिफ (खुदा शनास) वह है जिसका दिल अर्श और हरमैन के चक्कर लगाता रहे।
27.
खामोश और गमगीन रहना बुजुर्गी की एक निशानी है।
28.
तमाम इबादतों से ज्यादा अफ्जल (उत्तम) लाचारों और मजलूमों की फरियाद को पहुचना है।
29.
आरिफ हर वक्त इष्क की आग में डूबा रहता है। अगर खड़ा है तो दोस्त ही के इश्क में खड़ा है, बैठा है तो उसी का जिक्र कर रहा है सोया है तो ख्याले दोस्त में बेखबर है और जागता है तो उसी के ख्याल में होता है।
30.
आरिफ पर एक हाल होता है, उस वक्त वह कदम उठाया करते है। एक कदम में हिजाबे अजमत से गुजर कर हिजाबे किब्रीयाई तक पहुंचते है और दूसरे कदम में वापस आ जाते है। यह बयान फरमाते हुए हजरत ख्वाजा गरीब नवाज र0 0 के आसू जारी हो गये।
31.
आरिफ वह है, तो कुछ चाहे सामने आ जाये और कुछ पूछे उसका जवाब मिले।
32.
बद बख्त वह है जो गुनाह करे और उम्मीद रखे कि मै मकबूल बन्दा हूं।
33.
सखावत करना नईम (नेमत वाने वाला ) होने की चाबी है।
34.
दुरवेश वह है जो हाजमन्दों को महरूम (निराश) वापस न करे।
35.
राहे मुहब्बत में जीत उसकी होती है जो दोनों जहान से बेताल्लुक हो जाये।
36.
तवक्कुल यह है कि लोगों के रंज व मुसीबत उठाए और किसी से शिकायत और इज्हार न करें।
37.
जितना ज्यादा अल्लाह में ध्यान होगा उतना ही ज्यादा हैरत बढे़गी।
38.
इल्म (ज्ञान) दरिया की धारा है और अल्लाह का ध्यान दरिया की एक लहर है, फिर खुदा कहां और बन्दा कहां। इल्म खुदा को है और इरफान (अल्लाह का ध्यान) बन्दे को है।
39.
अल्लाह में ध्यान रखने वाले सूरज की तरह रोशन रहते हैं और तमाम दुनिया को रोशन रखते है।
40.
आरिफ मौत को दोस्त, आराम को दुश्मन और अल्लाह के जिक्र को पयारा रखते है।
41.
जो शख्स वुजू करके सोता है उसकी रूह अर्श के नीचे सैर करती रहती है।
42.
आशिकों का दिल मुहब्बत की आग से जला हुआ होता है और जो कुछ उसके अन्दर आता है यह आग उसको भी जलाकर राख कर देती है।
43.
मुहब्बत में अदना  दर्जा यह है कि अल्लाह की सिफात  उसमें दिखाई दे और आला दर्जा यह है कि अगर उस पर कोंई दावा करे तो उसको उलटा मुजरिम बना दे।
44.
दुरवेशों के लिए सबसे बड़ी नेमत यह है कि दुरवेशों के पास बैठें और सबसे बड़ा नुक्सान यह है कि दुरवेशों से दूर रहे।
45.
कोई शख्स इबादत से अल्लाह का कुर्ब (निकटता) हासिल नही कर सकता जब तक नमाज न पढ़े क्योकिं नमाज ही बन्दे को अल्लाह से मिलाएगी ।
46.
चार खूबियां नफ्स की जौहर हैं-
(1)
गरीबी में अमीरी का इज्हार करना।
(2)
भूख के वक्त सेरी का इज्हार करना।
(3)
गम के वक्त खुश रहना।
(4)
दुश्मन के साथ दोस्ती करना।
47.
नमाज अल्लाह के कुर्ब का जीना (सीढ़ी) है।
48.
झूठी कमस खाने वाले के घर से बरकत जाती रहती है और वह बर्बाद हो जाता है।
49.
अलहम्दु शरीफ कसरत से पढ़ना हाजतों को पूरी करने के लिए उत्त्म इलाज है।
50.
मौत से पहले मौत की तैयारी करो और मौत को हर वक्त सर पर रखों।
51.
खुदा जिसको दोस्त रखता है उसके सर पर बलाओं की बारिश करता है।
52.
कुरआन पाक का देखना सवाब है, पढ़ना सवाब है, अगर एक शब्द पर निगाह पड़े तो दस बदियां दूर हो जायें और दस नेकियां लिखी जायें। आंखों की रोशनी बढ़े और उसकी आंख पर कभी कोई मुसीबत न हो।
53.
काबतुल्लाह की जियारत से एक हजार साल की इबादत का सवाब मिलता है। हज का सवाब अलग है।
54.
आलिम की जियारत और दुरवेशों की दोस्ती से बरकत हासिल होती है।
55.
कमाले ईमान में तीन चीजें है-
(1)
खौफ
(2)
रजा (उम्मीद)
(3)
मुहब्बत
56.
मां-बाप का मुंह देखना औलाद के लिए इबादत है। जो लड़का मां-बाप की कदम बोसी हासिल करता है उसके पिछले गुनाह माफ कर दिए जाते है। ख्वाजा बायजीद बुस्तामी र0 0 ने फरमाया कि मैनं जितने भी मर्तबे पाए अपने मां-बाप से पाये।
57.
जिस किसी ने जो कुछ पाया पीर की खिदमत से पाया। बस मुरीद को चाहिए कि थेड़ा भी पीर के फरमान से आगे न बढ़े और पीर जो कुछ उसको तलकीन (शिक्षा) करे उस पर कान धरे और अमल करे।
58.
जो शख्स आबेदस्त (पाकी) के बाद वुजू में उंगलियो में खिलाल करता रहे उसकी उंगलियां दोजख की आग से महफूज रहेगी।
59.
वुजू में हर अंग को तीन बार धोना सुन्नत है और उसकी कमी या ज्यादती खलल है।
60.
मस्जिद में जाओ तो दायां पैर पहले अन्दर रखो जब वापस आबो तो बायां पैर पहले निकालो। (सुन्न्त)
61.
नापाकी आदमी के बदन में बाल-बाल के नीचे होती है इसलिए गुस्ल (स्नान) के वक्त हर बाल में पानी पहुंचना चाहिए। अगर एक बाल भी सूखा रहे तो पाकी न होगी।
62.
आदमी का मुंह पाक होता है चाहे मोमिन हो या काफिर।
63.
नमाज एक ओहदा (पद) है अगर इस ओहदे की सलामती के साथ जिम्मेदारी पूरी की तो निजात (मुक्ति) है, वरना खुदा के सामने शर्मिन्दगी की वजह से मुंह सामने न होगा।
64.
अरबाबे सुलूक की सही तौबा तीन चीजों से पैदा होती है-
पहला- रोजा रखने की नीयत से कम खाना।
दूसरा- महबूब के जिक्र की गरज से कम बोलना।
तीसरा- इबादत करने की गरज से कम सोना।
65.
तसव्वुक में न रस्में है कि जिनकी पाबन्दी हो सके और न कुछ इल्म है जिनका पढ़ कर हासिल करना आसान हो बल्कि यह मुहब्बत और तरीकत वालों के नजदीक तसव्वुफ खुदा के बन्दों के साथ खुशी व नर्मी से पेश आना है।
66.
आरिफ वही है जिसमें तीन बाते पायी जाएं। पहली-खौफे खुदा, दूसरी-ताजीम, तीसरी हया (लज्जा)।
67.
अगर नमाज के अरकान ठीक तरह से अदा न हुए हो वह पढ़ने वाले के मुंह पर मार दी जाती है। (हदीस)
68.
खुदा-ए-तआला ने किसी इबादत के बारे में इतनी ताकीद नही फरमाई जितनी नमाज के लिए।
69.
जिस कदर दिल लगाकर और सुकून से नमाज अदा करेगा उतना ही खुदा तआला की नजदीकी हासिल होगी।
70.
कब्रस्तान इबरत (नसीहत) की जगह है वहां जाकर हंसना, कहाकहा लगाना, खाना-पीना या कोई और दुनियावी काम नही करना चाहिये।
71.
जो शख्स इबादत नही करता वह हराम रोजी खाता है।



 TO BE CONTINUED..... 

Sunday, 18 June 2017

हजरत इमाम अली -21 RAMADAN SHAHDAT E ALI A.S.


                           بسم الله الرحمان الرحیم 
आपकी विलादत अल्लाह के घर पवित्र काबे शरीफ मे हुआ थी ।कहा जाता है कि आपकी वालदा आपकी विलादत के पहले जब काबे शरीफ के पास गयीँ तो अल्लाह के हुक्म से काबे की दीवार ने आपकी मां को रास्ता दे दिया था
उनके काबे मे तशरीफ लाने के चार दिन बाद 13 रजब को इमाम अली पैदा हुए ।मोहम्मद मुस्तफा स. स. का आपकी ज़िँदगी पर गहरा असर पड़ा था ।चाहे वह मस्जिद हो ,जंग का मैदान हो या फिर आम जगह इमाम अली हर वक्त पैग़म्बरे इस्लाम के साथ रहते थे ।यहाँ तक कि जब रसूले अकरम शबे मेराज पर गये तो अपने बिस्तर पर अली को सुला कर गये थे ।एक गिरोह पैगम्बरे इस्लाम को कत्ल करना चाहता था ,तो अल्लाह ने उन्हेँ शबे मेराज पर एक रात के लिए बुला लिया ।हमलावर गिरोह पहचान ना सके इस लिए अली रसूल के बिस्तर पर ऐसे सोये कि वह लोग पहचान नही सके ।

खुदा कि सिफात के आईनेदार ,तमाम सिफात के मरकज़ यही अली आज से करीब 1352 साल पहले 661 ई. मे माहे रमज़ान मुबारक की 21 वीँ तारिख को कूफे की मस्जिद मे सुबह की नमाज़ के वक्त शहीद कर दिये गये । 19 रमज़ान को सहरी के बाद जब सुबह की नमाज़ अदा की जा रही थी तो नमाज़ियोँ के बीच खड़े कातिल रहमान इब्ने मुलज़िम ने ज़हर से बुझी तलवार से मौला अली पर वार कर दिया ।आप इसके बाद दो दिन तक बिस्तर रहे ।रवायत है कि मोहम्मद मुस्तफा स.स. ने मौला अली को कातिल की पहचान और उसके बारे मे बता दिया था ।19 रमज़ान को नमाज़ के वक्त मौला अली ने ये जानते हुये कि यही कातिल है ,उसे नमाज़ के लिए उठाया था ।अब देखिये अली का इंसाफ ,हमले के बाद नमाज़ियोँ ने इब्ने मुलज़िम को पकड़ लिया था ।मॉला अली ने र्निदेश दिया कि इसके खाने पीने का पूरा ख्याल रखा जाये और चूंकि इसने तलवार से एक वार किया है इस लिए इस पर भी एक ही वार किया जाये ।

हजरत अली के मशहूर कोल (SAYINGS OF IMAM ALI A.S)
मुश्किलों की वजह से चिंता में मत डूबा करो! सिर्फ बहुत अंधियारी रातों में ही सितारे ज्यादा तेज़ चमकते हैं.
एक अच्छी रूह और दयालु ह्रदय को कोई चीज़ इतनी दुःख नहीं पहुंचाती जितना उन लोगों के साथ रहना जो उसे नहीं समझ सकते.
महान व्यक्ति का सबसे अच्छा काम होता है माफ़ कर देना और भुला देना.
ज़िन्दगी में दो तरह के दिन आतें हैं एक जिसमे आप जीतते हैं,और दूसरा वो दिन जो आपके खिलाफ जाता है. तो जब तुम्हारी जीत हो तो घमंड मत करो और जब चीज़ें तुम्हारे खिलाफ जाएँ तो सब्र करो. दोनों ही दिन तुम्हारे लिए परीक्षा हैं.
जब दुनिया आपको घुटनों के बल गिरा देती है तब आप प्रार्थना करने की सर्वोत्तम स्तिथी में होते हैं.
सब्र से जीत तय हो जाती है.
शिष्टाचार अच्छा व्यवहार करने में कुछ खर्च नहीं होता पर यह सबकुछ खरीद सकता है.
सम्मान पूर्वक साफगोई से मना कर देना एक बड़े और झूठे वादे से बेहतर होता है.
इन्सान भी कितना अजीब है की जब वह किसी चीज़ से डरता है तो वह उससे दूर भागता है लेकिन यदि वह अल्लाह से डरता है तो उसके और करीब हो जाता
चुगली करना उसका काम होता है जो अपने आप को बेहतर बनाने में असमर्थ होता है.
तुम्हारे दोस्त भी तीन हैं और दुश्मन भी तीन.
तुम्हारे दोस्त ….एक तुम्हारा दोस्त, तुम्हारे दोस्त का दोस्त और
तुम्हारे दुश्मन का दुश्मन तुम्हारे दुश्मन ….. तुम्हारा दुश्मन, तुम्हारे दोस्त का दुश्मन और तुम्हारे दुश्मन का दोस्त
आँखों के आंसू दिल की सख्ती की वजह से सूख जातें हैं और दिल बार बार गुनाह करने की वजह से सख्त हो जाता है.
तुम्हारा एक रब है फिर भी तुम उसे याद नहीं करते लेकिन उस के कितने बन्दे हैं फिर भी वह तुम्हे नहीं भूलता.
सूरत बगेर सीरत के एसा फूल है जिसमे कांटे ज्यादा हो और खुशबू बिलकुल न हो.
अगर किसी का तरफ आज़माना हो तो उसको ज्यादा इज्जत दो वह आला तरफ हुआ तो आपको और ज्यादा इज्ज़त देगा और कम तरफ हुआ तो खुद को आला समझेगा
कभी भी किसी के पतन को देखकर खुश मत हो क्यों की तुम्हे पता नहीं है भविष्य में तुम्हारे साथ क्या होने वाला है.
खालिक से मांगना शुजाअत है अगर दे तो रहमत और न दे तो हिकमत. मखलूक से मांगना जिल्लत है अगर दे तो एहसान और ना दे तो शर्मिंदगी.
अपनी सोच को पानी के कतरों से भी ज्यादा साफ रखो क्यों की जिस तरह कतरों से दरिया बनता है उसी तरह सोच से इमान बनता है.
आज का इन्सान सिर्फ दोलत को खुशनसीबी समझता है और ये ही उसकी बदनसीबी है.
बात तमीज़ से और एतराज़ दलील से करो क्यों की जबान तो हेवानो में भी होती है मगर वह इल्म और सलीके से महरूम होते हैं .

Tuesday, 13 June 2017

ZAKAT KA BAYAAN- HINDI- ZAKAT KE EHKAM- AHMIYAT IN ISLAM

بسم الله الرحمان الرحیم 

ZAKAT KA BAYAAN:



Al Quran : Zakat mufliso aur mohtajon aur uska kaam karne walon ka haq hai aur jinki diljoyee karni hai aur gulam ki gardan churhane mein aur 

Qarzdaron ke Qarz (ada karne) mein aur Allah ki raah mein aur
musafir ko ye Allah ki taraf se muqarrar kiya hua hai aur
Allah janne wala hikmat wala hai
Surah Tauba (9) , Verse 60



(Aye Rasool’Allah!) Aap Farmao,

Beshaq! Mera Rab Rizq Wasi’a Farmata Hai Apne Bando Me Jiske Liye Chahe
Aur Tangi Farmata Hai Jiske Liye Chahe
Aur Jo Cheez Tum Allah Ki Raah Me Kharch Karo
Uske Badley Aur Dega Aur Woh Sabse Behtar Rizq Dene Wala Hai.



 (Sureh-Saba-34, Ayat 39)





Unki Misaal Jo Apne Maal Allah Ki Raah Me Kharch Karte Hai

Uss Dane Ki Tarah Hai Jisko Saat Baali Nikley Aur Unn Har Baaliyon Me Se Sou-Sou Daane Nikle
Aur Allah Uss Se Bhi Zyada Barhaaye Jiske Liye Chahe Aur Allah Wus’at Wala Ilm Wala Hai.



– (Sureh-Bakrah-02, Ayat 261)





Zakat San 2 Hijri Me Musalmano Par Farz Hui,Islam Me Shuru Se Hi Garibo Ki Madad Karne Par Tawajjoh Dilai Jati Thi. Par Iske Liye Koi Mukammal Qayda Nahi Tha. Daulatmand Jo Bhi Karte Apne Dilse Karte The. ALLAH Subhan Wa Ta'ala Ne Zakat Ko Islam Ka 3ra Rukn Karar Diya Aur Ab Musalmano Par Zakat Farz Hui.










Allah ta’ala farmata hai kamyabi pate hain wo log jo zakat adaa krte hai aur farmata hai jo kuchh tum kharch kroge Allah ta’ala uski jagah aur dega
aur Allah behtar rozi dene wala hai,aur farmata hai jo log bukhal karte hai uske sath jo Allah ne apne fazal se unhe diya wo ye gumaan na kare ki yeh unke liye achha hai balki yeh unke liye bura hai usi cheej ka qayamat ke din unke gale mein TauQ dala jaega jiske sath Bukhal kia hoga.




Zakaat Kin pe Farz hai?



( 1 ) Musalman Hona Yani Kafir Par Zakaat Farz Nahin

( 2 ) Baligh Hona Yani Na Baligh Par Zakaat Farz Nahin

( 3 ) Aaqil Hona Yani Deewane(Pagal) Par Zakaat Farz Nahin

( 4 ) Azaad Hona Yani Laundi Ghulam Par Zakaat Farz Nahin

( 5 ) Maalike Nisaab Hona Yani Jis Ke Paas Nisaab Se Kam Maal Ho Us Par Zakaat Farz Nahin

( 6 ) Pure Taur Par Maalik Ho Yani Is Par Qabza Bhi Ho

Tab Zakaat Farz Hai Warna Nahin

Maslan Kisi Ne Apna Maal Zameen Mein Dafan Kar Diya Aur Jagah Bhool Gaya

Fir Barson Ke Baad Jagah Yaad Aai

Aur Maal Mil Gaya Toh Jab Tak Maal Na Mila Tha Us Zamane Ki Zakaat Wajib Nahin

Kunki Nisaab Ka Maalik Toh Tha Magar Is Par Qabza Nahin Tha

( 7 ) Nisaab Ka Qarz Se Faarigh Hona

Agar Kisi Ke Paas Ek Hazar Rupye Hai

Magar Woh Ek Hazar Ka Maqrooz Bhi  Hai Toh Us Ka Maal Qarz Se Faarigh Nahin

Lihazah Us Par Zakaat Nahin

( 8 ) Nisaab Ka Hajate Asliya Se Faarigh Hona

Hajate Asliyya Yani Aadmi Ko Zindagi Basar Karne Mein Jin Chizon Ki Zarurat Hai

Maslan Apne Rahne Ka Makan Jadey Garmiyon Ke Kapde Gharelu Saman

Yani Khane Pine Ke Bartan Charpaiyan Kursiyan Mezein Chulhe Pankhe Waghairah

In Maalon Mein Zakaat Nahin Kunki Yeh Sab  Malo Saman Hajate Asliyya Se Farigh Nahin Hain

( 9 ) Maale Nami Hona Yani Badhne Wala Maal Hona

Khwah Haqeeqatan Badhne Wala Maal Jaise Maale Tijarat

Aur Charayi Par Chhodey Hue Janwar

Ya Hukman Badhne Wala Maal Ho Jaise Sona Chandi

Ki Yeh Isi Liye Paida Kiye Gae Hain Ki In Se Chizen Kharidi Jayen

Aur Bechi Jayen Taki Nafa-a Hone Se Ye Badhte Rahen

Lihazah Sona chandi Jis Haal Mein Bhi Ho Zewar Ki Shakl Mein Hon

Ya Dafn Hon Har Haal Mein Yeh Maale Nami Hain

Aur Inki Zakaat Nikalna Zaruri Hai

( 10 ) Male Nisaab Par Ek Saal Guzar Jana

Yani Nisaab Pura Hote Hi Zakaat Farz Nahin Hogi

Balki Ek Saal Tak Woh Nisaab Milk Mein Baqi Rahe Toh

Saal Pura Hone Ke Baad Is Ki Zakaat Nikali Jaye




                   

Sone Ka Nisab Sadhe Saat Tolah Hai

Aur Chandi Ka Nisab Sadhe Bawan Tolah Hai

Sone Chandi Main Chaliswan Hissa Zakaat Nikaal Kar Ada Karna Farz Hai

Yeh Zaruri Nahin Ki Sone Ki Zakaat Mein Sona  Hi

Aur Chandi Ki Zakaat Mein Chandi Hi Di Jaye

Balki Yeh Nhi Jayez Hai Ki Bazari Rate Se Sone Chandi Ki Qeemat Laga Kar Rupye Zakaat Mein Dein.

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Pahanne ke Zewraat ki zakat
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 Amr ibn al-'As Radi Allahu Anhu se rivayat hai ki Ek Aurat Rasool-Allah Sal-Allahu Alaihi Wasallam ke pass aayee uski beti bhi uskey saath thi aur uski beti ke haath mein soney (gold) ke do bade bade kangan they Aap Sal-Allahu Alaihi Wasallam ne pucha kya aap in kangano ki zakat dete ho ? usney kaha nahi , Aap Sal-Allahu Alaihi Wasallam ne farmaya kya aapko ye pasand hai ki Qayamat ke din Allah aapko Aag ke kangan pahnaye ye sunkar usne usi waqt kangan utar diye aur aapki khidmat mein pesh kartey huye kaha ki ye Allah aur uskey Rasool-Allah Sal-Allahu Alaihi Wasallam ke liye hai

Sunan Abu Dawud, Jild 1, 1550-Hasan



 Abdullah bin shaddad Radi allahu anhu se rivayat hai ki hum log Aisha Radi allahu anha se paas gaye wo kahne lagi merepaas Rasool-Allah Sal-Allahu alaihi wasallam aaye Aapne mere haath mein chandi ki anguthiyan dekhi aur farmaya , Aisha ye kya hai ? maine arz kiya ki ye maine isliye banwayee hai ki aapke liye banao singar karu , Aap Sal-Allahu alaihi wasallam ne pucha , kya aap inki zakat ada karti ho maine kaha nahi , ya jo ALlah ko manzur tha kaha Aap Sal-Allahu alaihi wasallam ne farmaya ye aapko jahannam mein je jaane ke liye kaafi hai (agar aap zakat nahi dogi to)
Sunan Abu dawud, Jild 1, 1552-Sahih

Abu Hurairah radi allahu anhu se rivayat hai ki Rasool-Allah Sallallahu Alaihi Wasallam ne 
farmaya ki jisey Allah ne maal diya aur usney uski zakaat ada nahi ki to Qayamat ke din uska Maal nihayat zahreeley ganjey saanp ki shakal ikhtriyar kar lega uski aankhon ke pass do siyah(black) nuqtey honge jaise saanp ke hote hain phir wo saanp uskey dono jabdo se usey pakad legaaur kahega ki main tera maal aur khazana hun 
Sahih Bukhari , Jild 2, 1403











ख्वाजा गरीब नवाज- मोईनुद्दीन चिश्ती अजमेर

Poetry by Sahib Ahmedabadi

 The arrogance of tyrants turns to dust   When a nation rises in rebellion   Those who sacrificed their lives and hearts for truth   Even pa...