Saturday, 21 April 2018

Farishtey ke bare me - Angels in Islam

‎ بسم الله الرحمن الرحيم‎
الصــلوة والسلام‎ عليك‎ ‎يارسول‎ الله ﷺ

फ़रिश्तों का बयान

सवाल- फ़रिश्ते किसे कहते हैं?

जवाब- फ़रिश्ते लतीफ जिस्म रखते हैं नूर से पैदा किये गऐ हैं उनको अल्लाह तआला ने यह कुदरत दी है कि जो शक़्ल चाहें इख्तियार करले।

(तकमीलुल ईमान सफ़्हा 9)

सवाल- फ़रिश्ते मर्द हैं या औरत?

जवाब- न मर्द हैं न औरत।
(तकमीलुल ईमान सफ़्हा 9)

सवाल- क्या फ़रिशतों की पैदाइश आदमियों की तरह है?

जवाब- नहीं बल्कि फ़रिश्ते लफ्जे"कुन"से पैदा किये गऐ हैं।
(आलहिदायतुल मुबारकह सफ़्हा 4)

सवाल- फ़रिश्तों की तादाद कितनी है?

जवाब- सही तादाद तो अल्लाह व रसूल जानें अल्बत्ता हदीस शरीफ में है कि आसमान व ज़मीन में कोई एक बालिशत जगह खाली नहीं जहाँ फ़रिश्तों ने सजदे में पेशानी न रखी हो ज़मीन से सिदरतुल मुन्तहा तक पचास हजार साल की राह है उसके आगे मुस्तवी उसकी दूरी खुदा जाने,इससे आगे अरशे आज़म के सत्तर परदे हैं हर हिजाब(परदे)से दूसरे हिजाब तक पाँच सौ बरस का फासला है और उससे आगे अर्श इन तमाम वुसअतों(ख़ाली मकाम)में फ़रिश्ते भरे हैं।
(मवाहिब लदिन्नया जिल्द 2 सफ़्हा 26/अलमलफूज जिल्द 4 सफ़्हा 9)

सवाल- सारी मख़लूकात में किस की तादात ज्यादा है?

जवाब- फ़रिश्तों की तादाद ज्यादा है हदीस शरीफ में है कि अगर सारी मख़लूकात को दस हिस्सो में तकसीम किया जाए तो नौ हिस्से फ़रिश्तों के हैं और एक हिस्सा सारी मख़लूकात का।
(तकमीलुल ईमान सफ़्हा 9/तफसीर जुमल जिल्द 4 सफ़्हा 534)

सवाल- क्या सब फ़रिश्ते एक ही बार में पैदा हो गऐ या उनकी पैदाइश का सिलसिला जारी है?

जवाब- पैदाइश का सिलसिला जारी है हदीस शरीफ में है कि अर्श की दाहनी तरफ नूर की एक नहर है सातों आसमान और सातों ज़मीन और सातों समुन्दरों के बराबर है इसमें हर सुबह हजरत जिब्राईल अलैहिस्सलाम नहाते है जिससे उनके नूर पर नूर और जमाल पर जमाल बढ़ता है फिर जब आप पर झाड़ते हैं तो जो बूंद गिरती है तो अल्लाह तआला उस से उतने-उतने हजार फ़रिश्ते बनाता है दूसरी हदीस में है कि चौथे आसमान में एक नहर है जिसे नहरे हयात कहते हैं हजरत जिब्राईल हर रोज़ उसमें नहाकर पर झाड़ते हैं जिससे सत्तर हजार कतरे झड़ते हैं और अल्लाह तआला हर कतरे से एक-एक फ़रिश्ता पैदा करता है।
(मवाहिब लदिन्नया जिल्द 2 सफ़्हा 26/अलहिदायतुल मुबारकाह सफ़्हा 9)

सवाल- क्या इसके इलावह कोई और भी सूरत है जिससे फ़रिशते पैदा होते हैं?
जवाब- हाँ एक फ़रिश्ता और है जिसका नाम रूह है यह फ़रिश्ता आसमान और ज़मीन और पहाड़ो से बड़ा है क़यामत के दिन तमाम फ़रिश्ते एक सफ़ में खड़े होंगे और यह फ़रिश्ता तन्हा एक सफ़ में खड़ा होगा तो इन सब के बराबर होगा यह फ़रिश्ता चौथे आसमान में हर रोज बारह हजार तसबीहें पढ़ता है और हर तसवीह से एक फ़रिश्ता बनता है,दुसरी हदीस शरीफ में है कि रूह एक फ़रिश्ता है जिसके सत्तर हजार सर हैं और हर सर में सत्तर हजार चहरे और हर चहरे में सत्तर हजार मूँह और हर मूँह में सत्तर हजार जुबानें और हर जुबान में सत्तर हजार लुगत यह उन सब लुगतों से अल्लाह तआला की तसबीह करता है और हर तसबीह से अल्लाह तआला एक फ़रिश्ता पैदा करता है(अल्लाहुअकबर)इसी तरह हदीस शरीफ में है कि हमारे आका हुजूर अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैह वसल्लम ने फरमाया जो मुझ पर मेरे हक़ की ताजीम के लिए दुरूद भेजे अल्लाह तआला उस दुरूद से एक फ़रिश्ता पैदा करता है जिसका एक पर पूरब और एक पशिचम में होता है अल्लाह तआला उस से फरमाता है दुरूद भेज मेरे बन्दे पर जैसे उसने मेरे नबी पर दुरूद भेजा पस वह फ़रिश्ता क़यामत तक उस पर दुरूद भेजता रहेगा इसी तरह नेक कलाम अच्छा काम फ़रिश्ता बनकर आसमान की तरफ़ बुलन्द होता है।
(ख़ाज़िन व मआलिम जिल्द 4 सफ़्हा 148वजिल्द 7 सफ़्हा 169/उम्दतुल क़ारी जिल्द 9 सफ़्हा

सवाल- क्या सारे फ़रिश्तों का मरतबा बराबर है?

जवाब- नहीं बल्कि उनमें भी इन्सानों की तरह अवाम और ख्वास हैं और ख्वास फ़रिश्ते रुतबे में आम फ़रिश्तों से अफ़ज़ल हैं।
(मवाहिब लदिन्नया जिल्द 2 सफ़्हा 45व46)

सवाल- खास फ़रिश्ते कौन-कौन हैं?

जवाब- यह हैं,
हजरत जिब्राईल अलैहिस्सलाम,
हजरत मीकाईल अलैहिस्सलाम,
हजरत इसराफील अलैहिस्सलाम,
हजरत इजराईल अलैहिस्सलाम,
अर्श उठाने वाले, मुकर्रबीन, कर्रोबीन,रूहानिय्यीन।
(मवाहिब लदिन्नया जिल्द 2 सफ़्हा 45)

सवाल- क्या इन खास फ़रिश्तों में भी कुछ को कुछ पर फ़ज़ीलत है?
जवाब- हाँ यह चार फ़रिश्ते हजरत जिब्राईल अलैहिस्सलाम हजरत मीकाईल अलैहिस्सलाम हजरत इसराफील अलैहिस्सलाम हजरत इजराईल अलैहिस्सलाम बाकी तमाम फ़रिश्तों से अफ़ज़ल हैं।
(मवाहिब लदिन्नया जिल्द 2 सफ़्हा 45/तकमीलुल ईमान सफ़्हा 9)

सवाल- इन चार फ़रिश्तों में कौन अफ़ज़ल है?
जवाब- हजरत जिब्राईल अलैहिस्सलाम।
(मवाहिब लदिन्नया जिल्द 2 सफ़्हा 45)

सवाल- इन्सान फ़रिश्तों से अफ़ज़ल है या फ़रिशते इन्सान से अफ़ज़ल हैं?
जवाब- जमहूर एहले सुन्नत के नज़दीक ख़ास इन्सान यानी नबी व रसूल खास फ़रिश्तों से अफ़ज़ल हैं और आम इन्सान यानी औलियाऐ किराम आम फ़रिश्तों से अफ़ज़ल हैं और ख़ास फ़रिश्ते आम इन्सानों से अफ़ज़ल हैं।
(मवाहिब लदिन्नया जिल्द 2 सफ़्हा 45/तफसीर कबीर जिल्द 4 सफ़्हा 84)

सवाल- क्या फ़रिश्तों के पर होते हैं?
जवाब- हाँ दो-दो तीन-तीन चार-चार और बाज़ फ़रिश्तों के तो इससे भी ज्यादा होते हैं जैसे कि हजरत जिब्राईल अलैहिस्सलाम के बारे में है कि आपके 600 पर हैं।
(तकमीलुल ईमान सफ़्हा 9)

सवाल- क्या फ़रिश्तों को लौहे महफूज का इल्म होता है?
जवाब- हाँ ख़ास फ़रिश्ते लौहे महफूज पर मुत्तलअ है और आम फ़रिशते अपने ख़ास के ज़रीऐ लौहे महफूज की कुछ बातों पर मुत्तलअ होते हैं।
(तफसीर अज़ीज़ी सूरऐ बक़र सफ़्हा 307)

सवाल- क्या फ़रिश्ते अंबियाऐ किराम से ज्यादा इल्म रखते हैं?
जवाब- नहीं अंबियाऐ किराम उनसे ज्यादा इल्म रखते हैं,इल्म ही ने हजरत आदम अलैहिस्सलाम को फ़रिश्तों से सजदा कराने का शर्फ बख्शा।
(ख़ाज़िन जिल्द 1 सफ़्हा 40व277)

सवाल- अल्लाह तआला ने फ़रिश्तों को किस कदर ताक़त व कुव्वत अता फरमाई है
जवाब- इसकी पूरी हकीक़त तो अल्लाह तआला जाने अलबत्ता एक रिवायत में है कि एक फ़रिश्ता दुनिया को हलाक करने के लिये काफी है।
(शरह शिफा जिल्द 1 सफ़्हा 735)

सवाल- क्या फ़रिश्ते भी हुजूर अकरम सल्ललाहो तआला अलैह वसल्लम की उम्मत हैं?
जवाब- हाँ उम्मा हैं आप उनकी तऱफ भी रसूल बनाकर भेजे गऐ।
(ज़रक़ानी जिल्द 1 सफ़्हा 165/सावी जिल्द 4 सफ़्हा 68)

सवाल- फ़रिश्तों ने हजरत आदम अलैहिस्सलाम को किस दिन सज्दा किया?
जवाब- जुमे के दिन जवाल से लेकर असर तक।
(मवाहिब लदिन्नया जिल्द 1 सफ़्हा 10)

सवाल- सबसे पहले किस फ़रिश्ते ने सज्दा किया?
जवाब- हजरत जिब्राईल अलैहिस्सलाम ने फिर हजरत मीकाईल अलैहिस्सलाम फिर हजरत इसराफील अलैहिस्सलाम ने फिर हजरत इजराईल अलैहिस्सलाम फिर मलाइका मुकर्रबीन ने।
(मवाहिब लदिन्नया जिल्द 1 सफ़्हा 10)

सवाल- क्या फ़रिश्तों के पीर होते हैं जिस तरह इन्सान और जिन्नात के लिए पीरो मुरशिद होते हैं?
जवाब- हाँ हुजूर गौसे आजम फरमाते हैं कि में आदमियों और जिन्नों और फ़रिश्तों सबका पीर हूंँ।
(बहजतुल असरार सफ़्हा 23/फ़तावा रिज़विया जिल्द 9 सफ़्हा 141)

सवाल- क्या फ़रिश्तों को देखना मुम्किन है?
जवाब- हाँ देखना मुम्किन है।
(फ़तावा हदीसीया सफ़्हा 145)

सवाल- क्या किसी ने देखा भी है?
जवाब- हाँ अंबियाऐ किराम सहाबऐ इज़ाम औलियाऐ किराम अपनी बेदारी में फ़रिश्तों को देखते हैं लेकिन उनकी असली सूरत में नहीं।
(ज़रक़ानी जिल्द 1 सफ़्हा 425/तफसीर अज़ीज़ी सूरऐ बक़र सफ़्हा 143)

सवाल- हजरत जिब्राईल अलैहिस्सलाम,हजरत मीकाईल अलैहिस्सलाम,हजरत इसराफील अलैहिस्सलाम,हजरत इजराईल अलैहिस्सलाम का अस्ल नाम क्या है और कुन्नियत क्या है?
जवाब- हजरत जिब्राईल अलैहिस्सलाम का अस्ल नाम अब्दुल्लाह है लेकिन इमाम सुहैली फरमाते है कि जिब्राईल सुरयानी जुबान का लफ्ज है जिसके माना अब्दुर्रहमान या अब्दुल अज़ीज़ के हैं एक कौल यह है कि अस्ल नाम अब्दुल जलील और कुन्नियत अबुलफ़तह है,
हजरत मीकाईल अलैहिस्सलाम का अस्ल नाम अब्दुर्रज़्ज़ाक और कुन्नियत अबुल ग़नाइम है,
हजरत इसराफील अलैहिस्सलाम का अस्ल नाम अब्दुल ख़ालिक और कुन्नियत अबुलमनाफिख है,
हजरत इजराईल अलैहिस्सलाम का अस्ल नाम अब्दुल जब्बार और कुन्नियत अबु यहया है।
(उम्दतुल क़ारी जिल्द 1 सफ़्हा 45व84)

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Tuesday, 13 March 2018

Nazr e bad se bachne ki dua -बीमारियों और बुरी नज़र से बचने की दुआ

बीमारियों और बुरी नज़र से बचने की दुआ

أَنِّي مَسَّنِيَ الضُّرُّ وَأَنتَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ 

मुझे तकलीफ़ हो रही है और तू सबसे बढ़ कर रहम करने वाला है, 

 सुरह अल अम्बिया (21), 83-84

أَذْهِبِ الْبَاسَ رَبَّ النَّاسِ ‏وَاشْفِ أَنْتَ الشَّافِي لاَ شِفَاءَ إِلاَّ شِفَاؤُكَ شِفَاءً لاَ يُغَادِرُ سَقَمًا

तकलीफ को दूर फरमा , ए लोगों के रब्ब और शिफा अता फरमा, तू ही शिफा देने वाला है , तेरे सिवा कोई शिफा देने वाला नहीं है ,ऐसी शिफा अता फरमा की बीमारी बिलकुल बाक़ी ना रहे.

सुनन इब्न माजा, जिल्द 1, 1619-सही

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْبَرَصِ وَالْجُنُونِ وَالْجُذَامِ وَمِنْ سَيِّئِ الأَسْقَامِ

या अल्लाह मैं तुझसे पनाह मांगता हूँ कोढ़ की बीमारी से , पागलपन से , जुज़ाम की बीमारी (इन्फेक्शन) से और तमाम बुरी बीमारियों से 

सुनन अबू  दाउद , जिल्द 1, 1541 सही

أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّةِ مِنْ كُلِّ شَيْطَانٍ وَهَامَّةٍ وَمِنْ كُلِّ عَيْنٍ لامَّةٍ

मैं पनाह माँगता हूँ अल्लाह की पूरे पूरे कलिमात के ज़रिए, हर शैतान से और हर ज़हरीले जानवर से और हर नुकसान पहुँचने वाली बुरी नज़र से

सही बुखारी, जिल्द 4, 3371

ANEESUL ARWAH- HINDI ME








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Tuesday, 22 August 2017

स्वाइन फ्लू ,-SWINE FLU-H1N1 PROTECTION DUA HINDI

                                                                بسم الله الرحمان ال رحیم


स्वाइन फ्लू , इनफ्लुएंजा यानी फ्लू वायरस के अपेक्षाकृत नए स्ट्रेन इनफ्लुएंजा वायरस A से होने वाला इनफेक्शन है। इस वायरस को ही H1N1 कहा जाता है। इसके इनफेक्शन ने 2009 और 10 में महामारी का रूप ले लिया था-लेकिन WHO ने 10 अगस्त 2010 में इस महामारी के खत्म होने का भी ऐलान कर दिया था। अप्रैल 2009 में इसे सबसे पहले मैक्सिको में पहचाना गया था। तब इसे स्वाइन फ्लू इसलिए कहा गया था क्योंकि सुअर में फ्लू फैलाने वाले इनफ्लुएंजा वायरस से ये मिलता-जुलता था। 

स्वाइन फ्लू के लक्षण
स्वाइन फ्लू के लक्षण भी सामान्य एन्फ्लूएंजा जैसे ही होते हैं 
-नाक का लगातार बहना, छींक आना

-कफ, कोल्ड और लगातार खांसी 
-मांसपेशियां में दर्द या अकड़न 
-सिर में भयानक दर्द

-नींद न आना, ज्यादा थकान 
-दवा खाने पर भी बुखार का लगातार बढ़ना

-गले में खराश का लगातार बढ़ते जाना


स्वाइन फ्लू का वायरस तेजी से फैलता है। कई बार मरीज के आसपास रहने वाले लोगों और तिमारदारों को चपेट में ले लेता है। लिहाजा, किसी में स्वाइन फ्लू के लक्षण दिखें तो उससे कम से कम तीन फीट की दूरी बनाए रखना चाहिए, स्वाइन फ्लू का मरीज जिस चीज का इस्तेमाल करे, उसे भी नहीं छूना चाहिए।

कैसे फैलता है
-स्वाइन फ्लू का वायरस हवा में ट्रांसफर होता है 
-खांसने, छींकने, थूकने से वायरस सेहतमंद लोगों तक पहुंच जाता है


डॉक्टरों का ये भी कहना है कि अगर किसी घर में कोई शख्स स्वाइन फ्लू की चपेट में आ गया तो, घर के बाकी लोगों को इससे बचने के लिए डॉक्टरी सलाह ले कर खुद भी इसकी दवाईयां खानी चाहिए।


स्वाइन फ्लू से बचाव इसे रोकना का बड़ा उपाय है, हालांकि इसका इलाज भी अब मौजूद है। आराम करना, खूब पानी पीना, शरीर में पानी की कमी न होने देना इसका सबसे बेहतर है।

वैसे सर्दी-जुखाम जैसे लक्षणों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली तुलसी, गिलोए, कपूर, लहसुन, एलोवीरा, आंवला जैसी आयुर्वेदिक दवाईयों का भी स्वाइन फ्लू के इलाज में बेहतर असर देखा गया है। सर्दियों में इन्हें लेने से वैसे भी जुखाम तीन फिट की दूरी पर रहता है, और स्वाइन फ्लू के वायरस से बचने के लिए भी इतने ही फासले की जरूरत होती है।


 

Tuesday, 15 August 2017

HAPPY INDEPENDENCE DAY- BEST POETRY BY AJMAL SULTANPURI KAHA HAI MERA HINDUSTAN








मुसलमां और हिन्दू की जान कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान,
मैं उसको ढूंड रहा हूँ – मैं उसको ढूंड रहा हूँ
मेरे बचपन का हिन्दुस्तान – मेरे बचपन का हिन्दुस्तान
न बंगलादेश न पाकिस्तान
मेरी आशा मेरा अरमान – मेरी आशा मेरा अरमान
वो पूरा-पूरा हिन्दुस्तान
मैं उसको ढूंड रहा हूँ – मैं उसको ढूंड रहा हूँ
वो मेरा बचपन वो स्कूल, वो कच्ची सड़कें उड़ती धूल
लहकते बाग़ महकते फूल – लहकते बाग़ महकते फूल
वो मेरा खेत मेरा खलियान
मैं उसको ढूंड रहा हूँ
मुसलमां और हिन्दू की जान कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान, मैं उसको ढूंड रहा हूँ
वो उर्दू गज़ले हिंदी गीत – वो उर्दू गज़ले हिंदी गीत
कहीं वो प्यार कहीं वो प्रीत
पहाड़ी झरनों के संगीत
देहाती लहरा पूर्वी तान
मैं उसको ढूंड रहा हूँ – मैं उसको ढूंड रहा हूँ
जहाँ के कृष्ण जहाँ के राम – जहाँ के कृष्ण जहाँ के राम
जहाँ की श्याम सलोनी शाम – जहाँ की श्याम सलोनी शाम
जहाँ की सुब्ह बनारस धाम – जहाँ की सुब्ह बनारस धाम
जहाँ भगवान करें इस्नान
मैं उसको ढूंड रहा हूँ
मुसलमां और हिन्दू की जान कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान, मैं उसको ढूंड रहा हूँ
जहाँ थे तुलसी और कबीर – जहाँ थे तुलसी और कबीर
जायसी जैसे पीर फ़क़ीर
जहाँ थे मोमिन ग़ालिब मीर – जहाँ थे मोमिन ग़ालिब मीर
जहाँ थे रहमन और रसखान
मैं उसको ढूंड रहा हूँ
मुसलमां और हिन्दू की जान कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान, मैं उसको ढूंड रहा हूँ
वो मेरे पुर्खों की ज़ागीर – वो मेरे पुर्खों की ज़ागीर
कराची लाहौर और कश्मीर
वो बिल्कुल शेर की सी तस्वीर – वो बिल्कुल शेर की सी तस्वीर
वो पूरा पूरा हिन्दुस्तान
मैं उसको ढूंड रहा हूँ – मैं उसको ढूंड रहा हूँ
जहाँ की पाक पवित्र ज़मीन – जहाँ की पाक पवित्र ज़मीन
जहाँ की मिट्टी खुल्दनशीन
जहाँ महाराज मोयुद्दीन – जहाँ महाराज मोयुद्दीन
गरीब नवाज़ हिन्दुस्तान
मैं उसको ढूंड रहा हूँ
मुसलमां और हिन्दू की जान कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान, मैं उसको ढूंड रहा हूँ
ये भूखा शायर प्यासा कवि – ये भूखा शायर प्यासा कवि
सिसकता चाँद सुलगता रवि
ये भूखा शायर प्यासा कवि – सिसकता चाँद सुलगता रवि
हो जिस मुद्रा में ऐसी छवि, करा दे अज़मल को जलपान
मैं उसको ढूंड रहा हूँ – मैं उसको ढूंड रहा हूँ
मुसलमां और हिन्दू की जान कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान, मैं उसको ढूंड रहा हूँ

Wednesday, 2 August 2017

SUFI HAMIDUDIN NAGAURI R.A. MAZAR- RAJASTHAN INDIA-

                                                          بسم الله الرحمان الرحیم 



हमीदुद्दीन नागौरी (1192-1274 ई.) ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के शिष्य थे। इन्होंने अपने गुरु के आदेशानुसार सूफ़ी मत का प्रचार-प्रसार किया। यद्यपि इनका जन्म दिल्ली में हुआ था, लेकिन इनका अधिकांश समय नागौरराजस्थान में ही व्यतीत हुआ था।
  • राजस्थान में अजमेर के बाद नागौर ही सूफ़ी मत का प्रसिद्ध केन्द्र रहा था।
  • मुइनुद्दीन चिश्ती के शिष्य हमीदुद्दीन नागौरी ने गुरु के आदेश से सूफ़ी मत का प्रचार किया।
  • इन्होंने अपना जीवन एक आत्मनिर्भर किसान की तरह गुजारा था।
  • नागौर से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित 'सुवाल' नामक गाँव में इन्होंने खेती भी की।
  • ये पूर्णतः शाकाहारी थे एवं अपने शिष्यों से भी शाकाहारी बने रहने को कहते थे।
  • इनकी ग़रीबी को देखकर नागौर के प्रशासक ने इन्हें कुछ नक़द एवं ज़मीन देने की पेशकश की थी, जिसे इन्होंने अस्वीकार कर दिया।
  • हमीदुद्दीन नागौरी समन्वयवादी थे और इन्होंने भारतीय वातावरण के अनुरूप सूफ़ी आन्दोलन को आगे आगे बढ़ाया।
  • नागौर में चिश्ती सम्प्रदाय के इस सूफ़ी संत की मजार आज भी इनकी याद दिलाती है।
  • इस मजार पर मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने एक गुम्बद का निर्माण करवाया था, जो 1330 ई. में बनकर पूर्ण हुआ।

हज़रत सुल्तानुत्तारिकीन सूफी हमीदुद्दीन नागौरी रहमतुल्लाहि अलैहि का नाम मुहम्मद है और लक़ब हमीदुद्दीन, सुल्तानुत्तारिकीन, सवाली, सूफी, सईदी और नागौरी हैं। आपके वालिद का नाम हज़रत अहमद था। आपके वालिद जब लाहौर से देहली तश्रीफ़ लाए उस वक़्त एक अरबी और इल्मे नुजूम के जानकार बुजुर्ग की लड़की (वालदा हज़रत सूफ़ी साहब) से आपका निकाह हुआ। हज़रत सूफी हमीदुद्दीन नागौरी जब अपनी मां के पेट में थे तभी आपके नानाजान ने आपकी मां को खुशख़बरी दे दी थी - ‘‘तेरे लड़का पैदा होगा, जिसका सीना उभरा हुआ होगा, उसका आधा बदन हरा होगा और मेरे मरने के बाद पैदा होगा।’’ हुजूर सूफी हमीदुद्दीन नागौरी अलैहिर्रहमा सन् 589 हिजरी मुताबिक 1193 ईस्वी में देहली फतह के बाद दिल्ली में पैदा होने वाले पहले बच्चे थे। 
आपके वालिद और वालदा बहुत नेक थे। हज़रत सुल्तानुत्तारिकीन खुद फरमाते थे - ”जिस वक़्त में पैदा हुआ उस वक़्त अगर कोई औरत मेरी मां से ज़्यादा नेक होती तो मैं उसके पेट से पैदा होता।“ जिस तरह उस ज़माने में आपकी वालदा बेमिस्ल थीं उसी तरह आपकी बीवी भी अल्लाह वाली और करामत वाली थीं। हजरत सूफी ख़ुद अपने पोते से फरमाते थे - ‘‘जिस वक़्त मैं दूल्हा बना था अगर कोई औरत तुम्हारी दादी से बेहतर होती तो मेरा निकाह उसी से होता।’’ आपकी बीवी का नाम बीबी ख़दीजा था। लाडनूं के हज़रत सय्यद फ़ुज़ैल अहमद हमदानी की बेटी थीं। बीबी ख़दीजा की इबादतो रियाज़त का आलम ये था कि हफ्ते में एक बार नीम के पत्तों से रोज़ा इफ्तार करती और घर के तमाम काम ख़ुद करती थीं। सूफी साहब ने फरमाया है कि -‘‘जिस किसी को कोई ज़रूरत हो तो शैख़ हमीद खुई या चाकपर्रां की दादी के रौज़े पर आकर अपनी ज़रूरत अल्लाह से कहे, इन्शाअल्लाह मन्नत जरूर पूरी होगी। सुब्हानल्लाह। सूफी हमीदुद्दीन नागौरी अलैहिर्रहमां ने बहुत से उलूम हज़रत मौलाना शम्सुद्दीन हलवाई से हासिल किए हालांकि मौलाना शम्सुद्दीन हलवाई के अलावा हज़रत हमीदुद्दीन खुई, हज़रत ख़्वाजा हमीदुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाहि अलैहि से भी फैज़ हासिल किया, मगर मुरीद आप सुल्ताने हिन्दुस्तान हज़रत ख़्वाजा मुईनुदद्दीन अजमेरी अलैहिर्रहमा से हुए हैं। हज़रत सुल्तानुत्तारिकीन सूफी हमीदुद्दीन नागौरी रहमतुल्लाहि अलैहि को आपकी इबादतो रियाज़त और शफक़त की वजह से ‘‘सुल्तानुत्तारिकीन’’ कहा जाने लगा। बताया जाता है कि नागौर के करीब ही में ‘‘सवाली’’ नाम के एक कस्बे में हज़रत सूफी अलैहिर्रहमां ख़ुद खेती किया करते थे उसी गांव की वजह से आपको ”सवाली“ भी कहा जाने लगा। एक वजह यह भी बताई जाती है कि आपने लोगों को दीनी बातें समाझाने के लिए सवाल-जवाब का तरीक़ा अपनाया था और मुनाजरे में भी आपका कोई सानी न था इसी वजह से आपको ‘‘सवाली’’ भी कहा जाता है। हज़रत के ख़ानदान के बुजुर्गों से यह रिवाज चला आ रहा था कि वे अपने नाम से पहले सूफी लिखा करते थे इसी वजह से आपके नाम से पहले भी सूफी लिखा जाता है और यही वजह है कि आप ‘‘सूफी’’ भी कहलाते हैं। जैसा कि सैरूल आरिफीन में शैख जमाली ने शैख निज़ामुद्दीन औलिया के मुताबिक बयान किया है कि शैख हमीदुद्दीन रहमतुल्लाहि अलैहि के दादा शैख सईद बुजुर्ग हजरत उमर इब्ने ख़त्ताब रदियल्लाहु अन्हु की औलाद से हैं इसलिए आपको ”फ़ारूक़ी“ भी कहा जाता है।
हज़रत सूफी हमीदुद्दीन की शुरूआती तालीम घर पर ही हुई। कुरआन की तफ़्सीर और तफ़्सीरे कश्शाफ की तालीम मौलाना शमसुद्दीन हलवाई से हासिल करने का शरफ़ हासिल किया। हदीस की किताब ”मशारिकुल अनवार“ की तालीम 1220 ईस्वी में मुहद्दिसे बदायूं ने एक ही बैठक में आपको पूरी करवा दी।
हज़रत सूफी हमीदुद्दीन नागौरी रहमतुल्लाहि अलैहि की दरगाह शरीफ सूबए राजस्थान के अज़ीमुश्शान शहर नागौर शरीफ में वाकेअ है। नागौर शहर के बड़े हिस्से में आपकी दरगाह बनी हुई है। दरगाह शरीफ़ में शानदार बुलन्द दरवाजा बना हुआ है, पत्थर पर बारीक नक्काशी देखने के लायक है। बताया जाता है कि यह आलीशान बुलन्द दरवाजा 15 शाबानुल मुअज्ज़म 730 हिजरी मुताबिक़ 1339 ईसवी में सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक की हुकूमत के ज़माने में तामीर हुआ। हज़रत सूफी हमीदुद्दीन नागौरी रहमतुल्लाहि अलैहि के मज़ार शरीफ पर कोई इमारत या गुम्बद बना हुआ नहीं है। आपका मज़ार शरीफ खुले आसमान जाल के दरख़्त के नीचे है। मज़ार के चारों तरफ सफे़द संगेमरमर का अहाता बना हुआ है। 
हज़रत सूफी हमीदुद्दीन नागौरी ने अपनी ज़िन्दगी को बेहद सादगी के साथ गुजारा और जो मिला उसी पर इत्मिनान व सब्र करते हुए रब का शुक्र अदा करते। हज़रत सूफी साहब अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी नागौर में सादगी के साथ बसर कर रहे थे। ग़रीबी का आलम ये था। इसी वजह और हालत की बिना पर नागौर के हाकिम ने थोड़ी ज़मीन और कुछ रुपये हज़रत की खिदमत में पेश किए मगर आपने उसे नामंजूर कर दिया। इस पर नागौर के हाकिम ने सुल्तान को खत लिख कर एक गांव और चांदी के 500 टके सूफी साहब की खिदमत में पेश करने के लिए मंगवा लिए। गुरबत का यह आलम था कि हज़रत की लूंगी फट गई थी और बीबी साहिबा के सर पर दुपट्टा भी ठीक से नहीं था जिसकी वजह से माई साहिबा अपने कुर्ते का पीछे का कपड़ा उठा कर सर को ढक लिया करती थीं। माई ख़दीजा ने अपने दुपट्टे और हज़रत की लूंगी के लिए सूत कात रखा था। 
हज़रत सुल्तानुत्तारिकीन सूफी हमीदुद्दीन नागौरी हमेशा रोज़ा रखते थे, हज भी कर चुके थे रही नमाज़ तो उसके बारे में आता है कि जिस वक़्त सूफी साहब नमाज़ पढ़ते तो नमाज़ ही में इतने खो जाते कि किसी की ख़बर न होती। एक बार का वाक़िआ है कि आप मस्जिद मे नमाज़ पढ़ रहे थे कि मौलाना शम्सुद्दीन हलवाई और दूसरे मिलने वाले अजमेर से आपके पास मस्जिद में आए। सूफी साहब उसी तरह नमाज़ की हालत में रहे और इतनी देर नमाज़ में रहे वो लोग वापस चले गए। कुछ दिनों बाद फिर मुलाक़ात हुई तो उन लोगों ने शिकायत की - हम तेरे पास आए थे और तू नमाज़ पढ़ता रहा, तो आपने क़सम खाई कि मुझे बिल्कुल ख़बर न थी कि कौन आया और कौन गया, सुब्हानल्लाह। मौलाना हलवाई खुद मानते थे कि नमाज़ हो तो हमारेे हमीद जैसी। माख़ूज - तारीख़ सूफ़ियाए नागौर

















Thursday, 27 July 2017

DUA AND AHDEESH RELATED TO MONSOON- तेज़ बारिश आंधी तूफ़ान के वक़्त की दुआ -BAARISH KI DUA- HINDI-ENGLISH

                      بسم الله الرحمان الرحیم 


Barish ki Dua – Dua for Rain –

Barish rokne ki Dua


In this post, you can read Dua for rain 
(Barish ke liye dua), Dua when it rains (Barish ki dua) and Dua to Stop Rain (barish rokne ki dua

Dua for Rain in Arabic :

اللّهُمَّ اَسْقِـنا غَيْـثاً مُغيـثاً مَريئاً مُريـعاً، نافِعـاً غَيْـرَ ضَّارٌ، عاجِـلاً غَـيْرَ آجِلٍ

Barish ke liye dua in Urdu :

اے اللہ! ہمیں ایسی بارش سے سیراب کر جو فائدہ مند ،سر سبز و شاداب ، نفع بخش ، نقصان نہ دینے والی اور جلد برسنے والی ہو

Dua for Rain in English :

O Allah, shower upon us abundant rain, beneficial not harmful, swiftly and not delayed.

Barish ke liye dua in Arabic :

Allaahumma ‘asqinaa ghaythan mugheethan maree’an maree’an, naafi’an ghayradhaarrin, ‘aajilan ghayra ‘aajilin.


Dua when it rains in Arabic:

اللّهُمَّ صَيِّـباً نافِـعاً

Barish ki dua in Urdu :

اے اللہ! اسے نفع بخش بارش بنادے

Dua when it rains in English :

O Allah, (bring) beneficial rain clouds.

Barish ki dua in Arabic :

Allaahumma sayyiban naafi’an.

Dua to Stop Rain in Arabic :

اللّهُمَّ حَوالَيْنا وَلا عَلَيْـنا، اللّهُمَّ عَلى الآكـامِ وَالظِّـراب، وَبُطـونِ الأوْدِية، وَمَنـابِتِ الشَّجـر

Barish rokne ki dua :

Allaahumma hawaalaynaa wa laa ‘alaynaa. Allaahumma ‘alal-‘aakaami wadh-dhiraabi, wa butoonil-‘awdiyati, wa manaabitish-shajari.

Barish rokne ki dua in English :

O Allah, let it pass us and not fall upon us, but upon the hills and mountains, and the center of the valleys, and upon the forested lands.
Being a Muslim it is our belief that all the universe(Sun, Moon, Stars etc) is in control of Allah. All the weathers, cloud’s, winds are in His control. It is He Who gives the rain and stop the rain. There are many prayers which can be said for rain. There are prayers for rain, prayers for when it rain and prayers to stop the rain. There are times when we need rain and it is for our benefit at those times we pray for rain. But there are times when we don’t need rain and it is not good for us if it rains, at those times we pray that it should not rain on us.

We all know that rain is very important for life on earth but we also know that rain can bring destruction to the life on earth. On one side where we see benefits of rain like it raises trees and different kind of crops, on the other hand, we see disadvantages of rain like extensive rain bring floods. So we all should learn barish ki dua, dua for rain, barish rokne ki dua and we should always pray to Allah for the rain which brings good things for us and pray so that all the evils stay away from us.


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आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है कि अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब बारिश को देखते थे तो फरमाते थे : ‘‘अल्लाहुम्मा सैयिबन नाफिअन’’ (ऐ अल्लाह, इसे लाभकारी बारिश बना)। इसे बुखारी (हदीस संख्या : 1032) ने रिवायत किया है।
तथा अबू दाऊद (हदीस संख्या : 5099) की एक रिवायत के शब्द में है कि आप फरमाते थे : ‘‘अल्लाहुम्मा सैयिबन हनीअन’’ (ऐ अल्लाह, इसे सुखद बारिश बना)। इसे अल्बानी ने सही कहा है।
‘‘अस-सैयिब’’ उस बारिश को कहते हैं जो बहने वाली हो। और इस शब्द का मूल स्रोत है : साबा, यसूबो ; जब बारिश हो। अल्लाह तआला का कथन है :
﴿أو كصيبٍ من السماء﴾ [البقرة :19]
‘‘या आकाश से होनेवाली बारिश के समान।'' (सूरतुल बक़रा 2: 19).
उसका वज़न ‘‘अस-सौब’’ शब्द से ‘‘फैइल’’ है।
देखें : खत्ताबी की ‘‘मआलिमुस-सुनन’’ (4/146) .
तथा बारिश के सामने होना ताकि वइ मनुष्य के शरीर के कुछ हिस्से को लग जाए, मुस्तहब (ऐच्छिक) है। क्योंकि अनस रज़ियल्लाह अन्हु से प्रमाणित है कि उन्हों ने कहा : हम अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ थे कि हमें बारिश पहुँची। वह कहते हैं कि : तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपना कपड़ा हटा दिया यहाँ तकि कि आपके शरीर पर बारिश लग गई। तो हमने कहा : ऐ अल्लाह के पैगंबर, आप ने ऐसा क्यों कियाआप ने फरमाया : ''क्योंकि वह आपके पालनहार के पास से अभी अभी आई है।’’
इसे मुस्लिम (हदीस संख्या : 898) ने रिवायत किया है।
तथा जब बारिश सख्त हो जाती थी तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यह दुआ करते थे : ‘‘अल्लाहुम्मा हवालैना वला अलैना, अल्लाहुम्मा अलल आकामि, वजि़्ज़राबि, व बुतूनिल अवदियह, व मनाबितिश्शजर’’ (ऐ अल्लाह, हमारे आसपास बारिश बरसा हमारे ऊपर नहीं, ऐ अल्लाह टीलों, पहाड़ियों, घाटियों के बीच में और पेड़ों के उगने के स्थानों में बरसा)। इसे बुखारी (हदीस संख्या : 1014) ने रिवायत किया है।
रही बात बादल की गरज सुनने के समय दुआ की : तो अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु से प्रमाणित है कि : ‘‘जब वह बादल की गरज सुनते थे तो बातचीत त्याग देते थे और कहते थे : ‘‘सुब्हानल्लज़ी युसब्बिहुर-रअ्दो बि-हम्दिहि वल-मलाइकतो मिन खीफतिहि‘‘ (पवित्रता है वह अस्तित्व जिसकी स्तुति व गुणगान के साथ बादल की गरज पवित्रता का वर्णन करती है और फरिश्ते भी उसके डर से।’’ (अर-रअद: 13), फिर वह कहते : यह पृथ्वी वालों के लिए कड़ी चेतावनी है।’’ इसे बुखारी ने ‘‘अल-अदबुल मुफ्रद’’ (हदीस संख्या : 723) और मालिक ने ''अल-मुवत्ता’’ (हदीस संख्या : 3641) में रिवायत किया है और नववी ने ‘‘अल-अज़कार’’ (हदीस संख्या : 235) में तथा अल्बानी ने ''सहीहो अदबिल मुफ्रद’’ (हदीस संख्या : 556) में इसकी इसनाद को सहीह करार दिया है।
इसके बारे में हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मनसूब कोई बात नहीं जानते हैं।
इसी तरह, हमारे ज्ञान के अनुसार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से बिजली देखने के समय कोई ज़िक्र या दुआ साबित नहीं है। और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।
दूसरा :
बारिश के अवतरित होने का समय, अल्लाह की अपने बंदों पर दया और कृपा करने, और उनके ऊपर भलाई के कारणों का विस्तार करने का समय है, तथा उस समय दुआ के क़बूल किए जाना की संभावना है। सहल बिन सअद रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में मरफूअन (जिसकी इसनाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तक पहुँचती हो) आया है कि : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : ''दो (दुआएं) रद्द नहीं की जाती हैं : अज़ान के समय, और बारिश के नीचे दुआ करना।’’ इसे हाकिम ने ''अल-मुस्तदरक'' (हदीस संख्या : 2534) और तब्रानी ने ‘‘अल-मोजमुल कबीर’’ (हदीस संख्या : 5756) में रिवायत किया है और अल्बानी ने सहीहुल जामि (हदीस संख्या :  3078) में सहीह कहा है।
अज़ान के समय दुआ से अभिप्राय : अज़ान के समय या उसके बाद दुआ करना है।
तथा बारिश के नीचे से अभिप्राय बारिश उतरने का समय है।
और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है

ख्वाजा गरीब नवाज- मोईनुद्दीन चिश्ती अजमेर

Poetry by Sahib Ahmedabadi

 The arrogance of tyrants turns to dust   When a nation rises in rebellion   Those who sacrificed their lives and hearts for truth   Even pa...